Tuesday, May 5, 2009

मेरी बहन " निहारिका " को श्रद्धांजलि...............



मुझे मेरे गुनाहों की सजा तो दो कोई ,
मैं एक लाश हू ,मुझे जरा दफना दो कोई,

क्या मिलेगा तुझे इस बेरहम खुदाई से,
अब किसी की भी न बंदगी करो कोई ,

हमने हमेशा ही खुद को रोते हुए देखा ,
फिर भी दिलकशी की जरुरत न मुझे कोई ,

उसे अब इल्म नहीं रहा अच्छाई और बुराई का,
उसकी रहबरी पे यकीं न करो कोई ,

अब आदत सी हो गयी है मुझको गमो की ,
रहमत न चाहिए मुझको और न भलाई कोई ,

चीखा था अपने ग़मों से तड़पकर जब "अंजुम" ,
दूर तलक मुझको न पड़ा दिखाई कोई


- कुलदीप अन्जुम

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